योगेंद्र यादव की चेतावनी और वह रास्ता जो निराशा को उम्मीद में बदल देता है
प्रस्तावना: चुप्पी तोड़ने का समय
आज हर जागरूक भारतीय के मन में एक बेचैनी है। लोकतंत्र के पर्याय रहे इस देश में अचानक ऐसा क्यों लगने लगा है कि बातें तो वही हो रही हैं, लेकिन माहौल कुछ और ही है? संविधान की भाषा वही है, लेकिन व्यवहार बदल गया है। बाज़ार में सब कुछ मिल रहा है, लेकिन भरोसा नहीं मिल रहा। विरोध करने की आवाज़ें हैं, लेकिन वे बौनी लगती हैं। क्या यह सिर्फ हमारा डर है, या सच में 'भारत का विचार' (Idea of India) खतरे में है?
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने इस सवाल का सबसे ईमानदार जवाब दिया है। उनकी हालिया लेख 'What is to be done?' हर उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है जो भारत के लोकतंत्र, विविधता और विकास की चिंता करता है। आइए, इस लेख के ज़रिए समझते हैं – संकट कितना गहरा है, और सबसे अहम – हम करें क्या?
पहला सच: चुनौती अभूतपूर्व है, पर हम हारे नहीं
योगेंद्र यादव साफ कहते हैं – हम अभी उस मुकाम पर हैं, जहां आज़ादी के बाद पहली बार भारत के तीन मूल स्तंभ – लोकतंत्र, विविधता और विकास – एक साथ घेरे में हैं। 1975 का इमरजेंसी भी सिर्फ लोकतंत्र पर वार था, 1984 या 2002 के दंगे विविधता पर चोट थे, लेकिन आज तीनों पर एक साथ हमला हो रहा है।
और सबसे चिंताजनक बात: यह हमला जनता के समर्थन से हो रहा है। पहली बार लोग अपनी मर्जी से ऐसी व्यवस्था को वैधता दे रहे हैं जो 'भारत के विचार' से टकराती है। यह 'प्रतिस्पर्धी अधिनायकवाद' (Competitive Authoritarianism) है – चुनाव तो होते हैं, लेकिन मैदान एक पक्ष के लिए पहले से झुका होता है। चुनाव के बाद तो अक्सर अधिनायकवादी शासन ही चलता है।
लेकिन फिर भी हम निहत्थे नहीं हैं। यादव कहते हैं – बहुत सी निराशा हमने खुद पैदा कर ली है। हमारे पास संसाधन हैं, बुद्धि है, लोकतंत्र की मज़बूत परंपरा है। बस जरूरत है – सही निदान और एक साहसिक रणनीति की।
दूसरा सच: मोदी कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक लंबी खामोशी का नतीजा हैं
बहुत से लोग मानते हैं कि 2014 में कोई गलती से मोदी जीत गए। यादव कहते हैं – यह भूल है। मोदी कोई हादसा नहीं, बल्कि दशकों की विफलताओं का परिणाम हैं। जब लोकतांत्रिक संस्थाओं (चुनाव आयोग, न्यायपालिका, मीडिया) को कमज़ोर किया जाता रहा, जब आर्थिक असमानता चरम पर पहुँची और गरीबी से निकले लोगों की आकांक्षाओं को कोई सार्थक दिशा नहीं दी गई, तो ऐसा नेता उभरना स्वाभाविक था जो 'मजबूत इरादों' और 'सांस्कृतिक गौरव' का वादा करे।
सबसे गहरी बात यह है कि हमारी आधुनिकता सतही रही है। शहरों में पनपी ईर्ष्या, अपनेपन की कमी और अनुकरण की प्रवृत्ति ने एक खालीपन बनाया। उस खालीपन को भरने के लिए नफ़रत और राष्ट्रवाद का ज़हरीला कॉकटेल काम कर गया। यह कोई साजिश नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चूक है।
प्रेरक पहलू यह है: जो गलतियाँ हुईं, उन्हें सुधारा जा सकता है। अगर हम कारणों को पहचान लें, तो समाधान भी निकल सकते हैं।
तीसरा सच: विपक्ष की तीन विफलताएँ – और उनसे सीख
यादव ने सबसे दिलचस्प बात यह कही कि आज तक मोदी शासन के खिलाफ जो रणनीतियाँ अपनाई गईं, वे लगभग सब विफल हो चुकी हैं या होंगी। जानिए कौन सी हैं वे:
1. इंतज़ार की रणनीति (Bubble Burst का इंतज़ार) – यह सोचना कि एक दिन गलतियाँ इतनी बढ़ जाएँगी कि सरकार खुद गिर जाएगी। लेकिन मोदी सरकार ने दिखा दिया कि नोटबंदी जैसी आपदा को भी 'जनहित' में बेचा जा सकता है। जनता गलतियाँ तो देखती है, लेकिन तब तक माफ कर देती है जब तक कोई बेहतर विकल्प न हो।
2. एंटी-मोदी मोड – हर चीज़ का विरोध करना। यह भी कारगर नहीं है क्योंकि लोग समझने लगते हैं कि 'विरोध के लिए विरोध' किया जा रहा है। जीएसटी विपक्ष की अपनी पुरानी माँग थी, फिर विरोध करने से बेतुकापन झलकता है।
3. बीजेपी के खेल में बीजेपी बनने की कोशिश – राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में पड़कर विपक्ष अपनी जमीन खो चुका है। आप किसी से उसकी अपनी भाषा में नहीं लड़ सकते जब वह मैदान का सबसे मजबूत खिलाड़ी हो।
तो फिर क्या करें? यहाँ उत्तर है – नया खेल, नए नियम।
चौथा सच: संकट ही अवसर है – रूपांतरण का मौका
यह लेख का सबसे प्रेरक हिस्सा है। यादव कहते हैं – हमें 2014 से पहले वाली भारत की स्थिति में नहीं लौटना है। क्योंकि वह भी आदर्श नहीं थी। वहाँ भी संस्थाएँ कमज़ोर थीं, धर्मनिरपेक्षता दिखावटी थी, सामाजिक न्याय अधूरा था। हमें पुनर्स्थापना (रिस्टोरेशन) नहीं, रूपांतरण (ट्रांसफॉर्मेशन) करना है।
इस संकट ने वह दरार पैदा कर दी है जिसमें हम नए सिरे से लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और विकास की परिभाषा लिख सकते हैं। कैसे?
· चुनाव सुधार को टाला नहीं जा सकता – राज्य वित्तपोषण, टिकट वितरण में पारदर्शिता।
· संस्थाओं को मजबूत करना – न्यायपालिका, मीडिया, चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र बनाना।
· धर्मनिरपेक्षता का नया स्वरूप – जो केवल मुसलमानों को सुरक्षा देने का नाम न हो, बल्कि हर समुदाय के भीतर लोकतंत्र लाए।
· विकास मॉडल – जो सिर्फ जीडीपी न देखे, बल्कि पर्यावरण, रोज़गार और असमानता को भी केंद्र में रखे।
यह एक कठिन काम है, लेकिन कोई मौका बिना संकट के नहीं आता।
पाँचवाँ सच: हमें हेजेमनी के खिलाफ 'प्रति-हेजेमनी' चाहिए
मोदी सिर्फ सत्ता में नहीं हैं, वे वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से हेजेमोनिक हैं। यानी लोगों ने उनकी भाषा, उनके प्रतीकों और उनके 'सच' को अपना लिया है। 'देशभक्त', 'स्वदेशी', 'गरीब का रखवाला' जैसे शब्दों पर उनका कब्ज़ा है। विपक्ष जब बोलता है तो उसे 'तुष्टिकरण', 'अर्बन नक्सल' या 'एंटी-नैशनल' लेबल लग जाता है।
तो क्या करें? प्रति-हेजेमनी (Counter-Hegemony) बनाएँ। यानी:
· नए प्रतीक – भीम, पेरियार, कबीर, फुले – को राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्जीवित करें।
· हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में एक नई लोकप्रिय राजनीतिक भाषा लिखें – जो अंग्रेजी अखबारों तक सीमित न रहे।
· हर गली-मुहल्ले, कॉलेज और ऑफिस में 'विचार की बातचीत' शुरू करें – क्योंकि बीजेपी की हेजेमनी तभी टिकी है जब दूसरी कोई आवाज़ नहीं है।
यादव का कहना है – अगर हमने ऐसा नहीं किया, तो आने वाले समय में हम एक विकृत भारत देखेंगे: जहाँ चुनाव होंगे, लेकिन आज़ादी नहीं होगी। जहाँ अर्थव्यवस्था बढ़ेगी, लेकिन अल्पसंख्यक और दलित सिकुड़ेंगे।
समापन: हार मानने वालों की कोई मूर्ति नहीं बनता
यह लेख पढ़ने के बाद पहली प्रतिक्रिया निराशा हो सकती है। लेकिन यादव इतने बड़े चिंतक हैं कि वे जानते हैं – बिना ईमानदार चेतावनी के आंदोलन नहीं बनता। दूसरी प्रतिक्रिया – और यही सही है – यह होनी चाहिए: अब हम नहीं चुप रहेंगे।
हमें पहले यह समझना होगा कि हमारी लड़ाई किसी एक व्यक्ति से नहीं, एक ऐसी व्यवस्था से है जिसे लोगों ने प्यार दिया है। और इसलिए जवाब भी वैचारिक, सांस्कृतिक और रचनात्मक होना चाहिए – न कि केवल नकारात्मक।
जैसा कि योगेंद्र यादव कहते हैं – यह संकट ही वह धक्का है जो हमें सुस्ती से बाहर निकालता है। अब वही करें जो इस वक़्त माँगता है: भारत के विचार को पढ़ें, बहस करें, संगठित हों और सबसे बढ़कर – उम्मीद न छोड़ें।
क्योंकि लोकतंत्र की कोई भी लड़ाई तब तक हारी नहीं होती, जब तक लड़ने वाला हार मानी न ले।
लेखक परिचय (साभार): यह लेख सामाजिक चिंतक योगेंद्र यादव के व्यापक विश्लेषण से प्रेरित है। sabkibaatmedia.com उन सभी आवाज़ों को स्थान देता है जो भारत को खुला, बहस करने वाला और समावेशी बनाए रखना चाहती हैं।



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