सूचना का अधिकार (RTI) कानून भारत के आम नागरिक के लिए सबसे शक्तिशाली हथियार रहा है। लेकिन आज, इस कानून की हालत और इसके कार्यान्वयन के तरीके कई सवाल खड़े कर रहे हैं। आपकी वेबसाइट के लिए एक एंगेजिंग और आसान भाषा में लिखा गया लेख यहाँ है: RTI: क्या आम जनता का यह 'ब्रह्मास्त्र' अब कमजोर पड़ रहा है? प्रस्तावना: "हमार पैसा, हमार हिसाब" – राजस्थान के छोटे से गांव से उठी यह गूंज साल 2005 में एक कानून बनी, जिसे हम 'सूचना का अधिकार' (RTI) कहते हैं। इस कानून ने आम आदमी को सरकार की फाइलों में झांकने और भ्रष्टाचार पर सवाल करने की ताकत दी। लेकिन क्या आज, दो दशक बाद, यह ताकत वैसी ही है? या अब यह सरकारी फाइलों के बोझ तले दबकर दम तोड़ रही है? 1. खाली पड़े पद: बिना सेनापति के जंग RTI कानून की सबसे बड़ी मजबूती इसके 'सूचना आयुक्त' होते हैं। मौजूदा स्थिति यह है कि देश भर के केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों में कई पद खाली पड़े हैं। जब सुनवाई करने वाले ही नहीं होंगे, तो न्याय कैसे मिलेगा? पदों के खाली होने की वजह से केसों का अंबार लग गया है, जिससे एक आम नागरिक को जवाब मिलने में सालों लग जाते हैं। 2. तारीख पर तारीख: बढ़ता बैकलाग एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के विभिन्न सूचना आयोगों में 3 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं। कई राज्यों में तो स्थिति ऐसी है कि अगर आप आज अपील फाइल करें, तो आपकी बारी आने में 10 से 15 साल लग सकते हैं। "देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है" – यह कहावत आज RTI पर सटीक बैठती है। 3. डिजिटल बाधाएं और जटिलताएं डिजिटल इंडिया के दौर में भी कई विभागों की RTI वेबसाइट्स ठीक से काम नहीं करतीं। कहीं पेमेंट गेटवे फेल हो जाता है, तो कहीं साइट 'अंडर मेंटेनेंस' रहती है। ग्रामीण इलाकों के लिए ऑनलाइन सिस्टम आज भी एक बड़ी चुनौती है, जिससे यह कानून 'पीपल-सेंट्रिक' होने के बजाय तकनीकी उलझनों में फंस गया है। 4. जवाब के नाम पर खानापूर्ति अक्सर देखा जा रहा है कि जन सूचना अधिकारी (PIO) सूचना देने के बजाय उसे टालने के बहाने ढूंढते हैं। "यह सूचना हमारे विभाग की नहीं है।" "यह जानकारी बहुत बड़ी है, इसे देने से संसाधन बर्बाद होंगे।" "यह तीसरे पक्ष (Third Party) की जानकारी है।" ऐसे गोल-मोल जवाबों से आवेदक निराश होकर पीछे हट जाता है। 5. पारदर्शिता पर प्रहार: बढ़ती गोपनीयता हाल के वर्षों में किए गए संशोधनों ने सूचना आयुक्तों की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए हैं। इसके अलावा, कई महत्वपूर्ण जानकारियों को 'राष्ट्रीय सुरक्षा' या 'गोपनीयता' के नाम पर देने से मना कर दिया जाता है। जिस कानून का मकसद 'गोपनीयता' को खत्म करना था, अब उसे ही पर्दे के पीछे धकेला जा रहा है। यह हमारे लिए क्यों चिंता का विषय है? RTI सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं है। यह आपकी सड़क, आपके राशन, आपके बच्चों के स्कूल और आपके टैक्स के पैसे का हिसाब है। अगर यह कानून कमजोर होता है, तो प्रशासन में भ्रष्टाचार और मनमानी बढ़ेगी। निष्कर्ष: अब आगे क्या? RTI को बचाने के लिए जरूरी है कि: आयोगों में खाली पदों को तुरंत भरा जाए। सूचना न देने वाले अधिकारियों पर सख्त जुर्माना लगे। पोर्टल्स को यूजर-फ्रेंडली बनाया जाए ताकि एक आम आदमी भी आसानी से आवेदन कर सके। अंतिम बात: लोकतंत्र में जनता मालिक होती है, और मालिक को हिसाब पूछने का पूरा हक है। RTI के गिरते स्तर को संभालना सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। वेबसाइट टिप: इस लेख के साथ एक 'कमेंट बॉक्स' जरूर रखें और लोगों से पूछें कि क्या उन्होंने कभी RTI लगाई है और उनका अनुभव कैसा रहा। इससे आपकी पोस्ट पर एंगेजमेंट बढ़ेगी।

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