यह संदेश उन रूढ़िवादी और ढोंगी 'व्हाट्सएप अंकलों' और 'आंटियों' के लिए है जो इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं।
आप लोग न तो सच पढ़ते हैं, न देखते हैं और न ही किसी मुद्दे को गहराई से समझते हैं। आप अपने सुरक्षित और आरामदायक दायरों से बाहर निकलकर दूसरों के दर्द को महसूस करने से साफ़ इंकार करते हैं, क्योंकि आप पूरी तरह से स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हैं। आप कागज़ी तौर पर पढ़े-लिखे होकर भी अनपढ़ हैं... इतने जानबूझकर अज्ञानी बने बैठे हैं कि सत्ता के अहंकार को व्यंग्य और निडरता से चुनौती देने के तरीके आपको समझ ही नहीं आते।
तो चलिए, मैं आपको समझाती हूँ... कई युवा प्रदर्शनकारियों के लिए तीखी भाषा, कड़वे व्यंग्य और मीम्स का इस्तेमाल करना सिर्फ़ ग़ुस्सा निकालने का ज़रिया नहीं है। यह एक सोचा-समझा तरीका है उस आभामंडल (अहंकार) को तोड़ने का, जो आपके इन प्यारे चुने हुए नेताओं के चारों ओर बुना गया है। इस बात को समझने के लिए ज़मीर और नीयत की ज़रूरत होती है—जिसकी कमी आप व्हाट्सएप और फेसबुक पर "संस्कारी ज्ञान" बाँटने वाले लोगों में साफ़ दिखती है। क्योंकि जब सत्ता में बैठे लोगों ने देश के महान नेताओं या नेता प्रतिपक्ष (LoP) का इससे भी ज़्यादा घटिया और अभद्र भाषा में अनादर करने की कोशिश की, तब आपके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।
आप लोग 'असुरक्षित और नाकाम परवरिश' (Failed Parenting) की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं ना? तो सुनिए, असली मायने में किसकी परवरिश नाकाम रही है: आपकी और आपके माता-पिता की।
आपकी परवरिश इसलिए नाकाम रही, क्योंकि आपके माता-पिता ने आपको यह कभी नहीं सिखाया कि सामूहिक हत्यारों और बलात्कारियों को सत्ता के पदों पर नहीं बैठने देना चाहिए। फिर भी आपने बिना कोई सवाल पूछे उन्हें वहाँ बिठाया
आपकी परवरिश इसलिए नाकाम रही, क्योंकि जब कमज़ोरों और लाचारों पर अत्याचार हुआ, उनका ख़ून बहाया गया और उन्हें मारा गया, तब आप चुप्पी साधे रहे।
आपकी परवरिश इसलिए नाकाम रही, क्योंकि उन्होंने आपको सिखाया कि अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से ज़्यादा बेहतर सत्ता की जी-हुज़ूरी करना है। उन्होंने आपको ताक़त के आगे सिर झुकाना, अपने आराम और फ़ायदे के लिए चुप रहना और अपनी इस कायरता को 'तटस्थता' (Neutrality) का नाम देना सिखाया।
आपकी परवरिश इसलिए नाकाम रही, क्योंकि उन्होंने आपको सोचना और सवाल करना कभी नहीं सिखाया—फ़ायदे और प्रोपेगैंडा को निगलना सिखाया। उन्होंने आपको नेताओं की बनाई हुई फर्जी छवि को भगवान मानना और टीवी पर परोसी गई नफ़रत को सच मानना सिखाया, बिना कभी सबूत या जवाबदेही मांगने की हिम्मत दिए।
आपकी परवरिश इसलिए नाकाम रही, क्योंकि उन्होंने आपको इंसानी दर्द और पीड़ा से ज़्यादा 'सभ्य और मीठी भाषा' की चिंता करना सिखाया। आपको कागज़ के टुकड़े पर लिखे तीखे शब्दों से तो ठेस पहुँचती है, लेकिन जब पुलिस की लाठियों से छात्रों के सिर और हाथ फोड़ दिए जाते हैं और युवा महिलाओं के कपड़े फाड़कर दिन-दिहाड़े उनका यौन उत्पीड़न किया जाता है, तब आप पत्थर की तरह खामोश रहते हैं। उन्होंने आपको दिखावटी शिष्टाचार तो दिया, लेकिन आपकी इंसानियत और आत्मा छीन ली।
आपकी परवरिश इसलिए नाकाम रही, क्योंकि उन्होंने आपको जातिगत आरक्षण पर आँसू बहाना सिखाया, लेकिन जब किसी इंसान को सिर्फ़ उसकी जाति की वजह से मार दिया जाता है, अपमानित किया जाता है या उसके बुनियादी मानवीय हक़ छीने जाते हैं, तब आपकी आँखों से एक भी आँसू नहीं निकलता। उन्होंने आपको बीमारी से इंकार करते हुए उसके इलाज से नफ़रत करना सिखाया।
इन छात्रों की परवरिश ज़मीर, आत्मसम्मान और रीढ़ की हड्डी के साथ हुई है। वहीं आपकी परवरिश डर, ग़ुलामी और उस खोखले नैतिक ज्ञान के साथ हुई है जो बड़े से बड़े जुर्म और अत्याचार को भी अनदेखा कर देता है।
शर्म आनी चाहिए आपको!
लेखिका: नीर कलम।

