आरोग्य सेतु 2.0: डिजिटल समाधान या महज एक और 'ऐप' का ड्रामा?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री जेपी नड्डा ने हाल ही में 'आरोग्य सेतु 2.0' का बिगुल फूंका है। सरकार का दावा है कि यह स्वास्थ्य सेवाओं को बदल देगा, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह 'नई बोतल में पुरानी शराब' परोसने जैसा है। जिस देश में अस्पताल की कतारें घंटों लंबी होती हैं और दवाइयां मयस्सर नहीं, वहां एक 'डिजिटल चमत्कार' की उम्मीद करना किसी कॉमेडी फिल्म के क्लाईमैक्स से कम नहीं है।
डिजिटल इंडिया का विरोधाभास: स्मार्टफोन बनाम भूखे पेट
सरकार की डिजिटल महत्वाकांक्षाएं उन विज्ञापनों की तरह हैं जो टीवी पर तो चमकते हैं, लेकिन हकीकत में धुंधले हैं। आरोग्य सेतु 2.0 की सफलता के लिए आधारभूत ढांचे की आवश्यकता है, जबकि एनएसएसओ (NSSO) की रिपोर्ट खुद चीख-चीख कर कह रही है कि 70% ग्रामीण भारत स्वास्थ्य बीमा से कोसों दूर है।
क्या डेटा से पेट भर सकता है?
- भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में अभी भी बिजली और इंटरनेट के दर्शन दुर्लभ हैं।
- क्या एक ऐप मरीज के टूटे हुए स्वास्थ्य ढांचे और डॉक्टरों की कमी को पूरा कर पाएगा?
- डिजिटल विभाजन के बीच 'स्मार्टफोन अनिवार्य' की शर्त गरीबों के लिए एक नई सजा की तरह है।
प्रशासनिक लापरवाही का 'डिजिटल संस्करण'
आरोग्य सेतु 2.0 का आगमन एक ऐसे दौर में हुआ है जब सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) खुद वेंटिलेटर पर हैं। प्रशासन का तर्क है कि तकनीक सब ठीक कर देगी, लेकिन तकनीक का उपयोग तब तक नहीं हो सकता जब तक अस्पताल की इमारतें खस्ताहाल हैं और वहां काम करने वाले कर्मचारियों के पास बुनियादी संसाधन नहीं हैं। यह कुछ ऐसा है जैसे बिना इंजन वाली गाड़ी में सबसे आधुनिक 'म्यूजिक सिस्टम' लगा देना और उम्मीद करना कि गाड़ी दौड़ने लगेगी।
निष्कर्ष: पुरानी समस्या, नया इंटरफ़ेस
आरोग्य सेतु 2.0 का शुभारंभ एक ऐसी उम्मीद है जिसे हकीकत की जमीन नसीब नहीं है। अगर सरकार को वास्तव में स्वास्थ्य सुधार करने हैं, तो उसे ऐप्स के 'डाउनलोड' से आगे बढ़कर अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या, दवाओं की उपलब्धता और डॉक्टरों की संख्या पर ध्यान देना होगा। अन्यथा, यह आरोग्य सेतु 2.0 सिर्फ एक और डिजिटल मकड़जाल साबित होगा, जहां लोग अपनी समस्याएं दर्ज तो करेंगे, लेकिन समाधान हमेशा की तरह 'सर्वर डाउन' या 'सिस्टम अपडेट' के नाम पर लटका रहेगा।
स्रोत:Sabki Baat Media
